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मंज़िल

निकला हूँ इसी उम्मीद से के इक दिन मंज़िल को पाना है
अभी अनभिज्ञ हूँ अंजान हूँ थोड़ा के किस दिशा में जाना है
रफ़्तार भी है और इरादा भी है मज़बूत मेरा
सफ़र कर दिया है शुरू अब चाहे हो राह में अंधेरा
आएँगी अड़चनें रोकेंगी तकलीफें आगे बढ़ने से
चलना तो होगा रास्ता नहीं कटेगा यूँही डरने से
कुछ पुराने रिश्ते ढीले कर नये बंधन बांधने होंगे
चाहतों और उम्मीदों के पहाड़ धैर्य से लांघने होंगे
गुमराह ना हो जाऊं भटक ना जाऊं सही दिशा से
रास्ता तय करना होगा सही निर्देश सही सलाह से
काबू में रखने होंगे नींद और थकान के झोंके
नियंत्रण भूख और प्यास पे भी बराबर रखना होगा
देर सेवर पहुँच ही जाऊँगा ग़र चलता रहा दृढ़निश्चय कर
भुला दूँगा रंज़ो-ग़म अपनी मंज़िल की बाँहों में लिपट कर

Hand Crafted Destiny